
कहते हैं कि घर दो पहियों से चलता है, लेकिन क्या हो जब एक पहिया अपनी दिशा ही बदल ले?
आज मैं ‘शून्य’ पर खड़ा हूँ। एक तरफ मेरी पुश्तैनी जमीन है, मेरा बगीचा है जिसे मैं अपने पसीने से सींचना चाहता हूँ, और दूसरी तरफ एक ऐसा खामोश संघर्ष है जो घर की चारदीवारी के भीतर रोज चलता है।
लोग कहते हैं कि पहाड़ की जिंदगी शांत होती है, लेकिन इस शांति के पीछे एक अकेलापन भी है। जब आप सुबह की पहली किरण के साथ खेत में कुदाल लेकर उतरते हैं और आपके साथ हाथ बंटाने वाला कोई न हो, तो वह कुदाल मिट्टी से ज्यादा आपके मन को खोदती है।
मेरे इस सफर के कुछ कड़वे लेकिन सच्चे अनुभव:
- उम्मीद का बोझ: हम अक्सर अपनों से उम्मीद लगाकर खुद को थका देते हैं। दूसरों के बदलने का इंतज़ार करने से बेहतर है खुद को मजबूत बना लेना।
- शून्य की ताकत: जब आपके पास खोने को कुछ नहीं होता, तब आपके पास पाने को पूरा जहान होता है। शून्य अंत नहीं, बल्कि एक नई शुरुआत की पहली सीढ़ी है।
- अकेले लड़ना: किसानी सिर्फ मिट्टी का काम नहीं है, यह तपस्या है। अगर साथी का मन शहर की चकाचौंध में है और आपका मिट्टी की खुशबू में, तो रास्ता कठिन हो जाता है।
मेरा 5 महीने का बच्चा जब मुझे देखता है, तो मेरी सारी थकान मिट जाती है। शायद मैं आज अपनी पत्नी को न समझा पाऊं, शायद मैं आज इस ‘जंगल’ को ‘मंगल’ न बना पाऊं, लेकिन मैं हार नहीं मानूंगा।
मैं लिख रहा हूँ ताकि मेरी खामोशी को शब्द मिल सकें। मैं लड़ रहा हूँ ताकि मेरा बेटा एक दिन अपनी जमीन पर फख्र कर सके।

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