
जाजरकोट और सल्यान के जंगलों में एक ऐसी जड़ी-बूटी छिपी है जो अपनी ताकत और आकार से किसी को भी हैरान कर सकती है। हाल ही में एक कलेक्शन सेंटर में मैंने अपनी आँखों से 80 से 90 किलो वजन का एक विशाल ‘बिरालगानो’ देखा। लेकिन इस अद्भुत प्राकृतिक संपदा के पीछे की व्यापारिक कहानी उतनी ही चिंताजनक है।
नाम और पहचान (विविध भाषाओं में)
इस जड़ी-बूटी को दुनिया भर में अलग-अलग नामों से जाना जाता है:
- नेपाली (स्थानीय नाम): बिरालगानो, बिरालु, गुजर्गानो, गिरालगानो, गुज्जरगानो, गुँदरगानो, मखमली पात।
- हिंदी नाम: पाठा (इसे ‘लघु पाठा’ भी कहते हैं, लेकिन ‘पाठा’ नाम ज्यादा प्रसिद्ध है)।
- अंग्रेजी नाम: Velvetleaf (वेलवेट लीफ)।
- वैज्ञानिक नाम (Scientific Name): Cissampelos pareira।
जाजरकोट के बिरालगानो की खासियत
यह एक बेल (Creeper) की जड़ है। जाजरकोट की शुद्ध मिट्टी और ऊँचाई (800-1800 मीटर) इसे इतना पोषण देती है कि यह जमीन के अंदर पत्थर जैसा ठोस और विशाल रूप ले लेती है। 90 किलो का एक ही कंद होना यहाँ की जैविक संपन्नता का सबसे बड़ा प्रमाण है।
औषधीय गुणों का भंडार
यह औषधि केवल पैसा कमाने का जरिया नहीं है, बल्कि आयुर्वेद में इसे ‘कायाकल्प’ करने वाला माना गया है:
- मधुमेह और पाचन: यह शुगर (Diabetes) को नियंत्रित करने और पेट के पुराने रोगों को ठीक करने में रामबाण है।
- सर्जरी में उपयोग: इसके चूर्ण का उपयोग शल्य चिकित्सा के दौरान सुन्न करने वाली दवाओं के निर्माण में भी किया जाता है।
- शक्तिवर्धक: इसे शरीर की कमजोरी दूर करने और नई ऊर्जा भरने वाली औषधि माना जाता है।
- पशु चिकित्सा: हमारे यहाँ इसका सबसे प्रसिद्ध उपयोग गाय-बैलों के लिए होता है। यदि पशु ‘रातो पिशाब’ (लाल पेशाब) कर रहे हों, तो इसके गानो का रस उन्हें तुरंत ठीक कर देता है।
- ज्योतिष और धामी-झांक्री: आमतौर पर हमारे यहाँ ज्योतिष और धामी-झांक्री इसका उपयोग ग्रह-नक्षत्रों की बाधाओं को दूर करने के लिए करते हैं। यहाँ के लोग इसके वैज्ञानिक गुणों से ज्यादा इसके आध्यात्मिक प्रभाव पर विश्वास करते हैं।
व्यापार का काला पक्ष: ₹10 किलो की कीमत
हैरानी और दुख की बात यह है कि जो ग्रामीण इन दुर्गम जंगलों से इसे खोदकर लाते हैं, उन्हें व्यापारी मात्र ₹10 प्रति किलो की कीमत देते हैं।
- खुला भंडारण: संकलन केंद्रों पर इन अनमोल कंदों को खुले आसमान के नीचे बेतरतीब ढंग से रखा जाता है, जिससे इनकी गुणवत्ता खराब होने का खतरा रहता है।
- विदेशी निवेश और प्रोसेसिंग: ठेकेदार इस माल को इकट्ठा कर सुर्खेत जिले के रामघाट भेजते हैं। वहां चीनी कंपनियों (Chinese Processing Centers) ने अपने प्लांट लगाए हुए हैं, जहाँ इसका शोधन कर इसे अंतरराष्ट्रीय बाजार में हजारों रुपये के भाव पर बेचा जाता है।
परंपरा और अज्ञानता के बीच फंसा ‘बिरालगानो’
जाजरकोट और हमारे ग्रामीण समाज में आज भी लोग इसके असली वैज्ञानिक महत्व से पूरी तरह अनजान हैं। सदियों से यहाँ के लोग इसका उपयोग केवल निम्नलिखित रूप में करते आ रहे हैं:
- ज्योतिष और तंत्र-मंत्र: स्थानीय लोग, ज्योतिष और धामी-झांक्री इसका प्रयोग मुख्य रूप से ग्रह-नक्षत्रों की दशा सुधारने या बुरी नज़र दूर करने के लिए करते हैं। यह यहाँ की लोक-मान्यता का हिस्सा बन चुका है।
- वैज्ञानिक जानकारी का अभाव: दुःख की बात यह है कि यहाँ के आम आदमी को अभी तक यह पता ही नहीं चल पाया है कि यह कंद असल में लघु पाठा है, जिसकी कंद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चिकित्सा विज्ञान और आधुनिक सर्जरी (Operation) में क्रांति ला रही हैं।
- अज्ञानता का फायदा उठाते बिचौलिए: क्योंकि स्थानीय लोग इसके असली वैज्ञानिक गुणों और असली बाज़ार मूल्य को नहीं जानते, इसी अज्ञानता का फ़ायदा उठाकर व्यापारी और ठेकेदार इसे मात्र ₹10 किलो में खरीदकर ले जा रहे हैं।
विनाश की कगार पर ‘बिरालगानो’: क्या हमारी अगली पीढ़ी इसे देख पाएगी?
आज जिस तरह से जंगलों में बिरालगानो (बिरालु) का अंधाधुंध दोहन हो रहा है, उसे देखकर मन में गहरी चिंता और डर पैदा होता है। हम अनजाने में अपने ही भविष्य की जड़ों को काट रहे हैं। इसके विलुप्त होने का खतरा अब कोई कहानी नहीं, बल्कि एक कड़वी हकीकत बन चुका है:
1. अस्तित्व का संकट (The End of a Legacy): बिरालगानो का एक कंद 80 से 90 किलो तक पहुँचने में कई दशक, शायद आधी उम्र बिता देता है। लेकिन व्यापारी के ₹10 किलो के लालच में लोग इसे चंद घंटों में उखाड़ फेंकते हैं। लोग मुनाफे की होड़ में छोटे पौधों और बीजों (बिउ) को भी नहीं छोड़ रहे हैं। जब जड़ और बीज ही नहीं रहेंगे, तो भविष्य में यह दोबारा कभी नहीं उगेगा।
2. परंपराओं का अंत
हमारे यहाँ ज्योतिष और धामी-झांक्री परंपरा में इसका उपयोग ग्रह-दशा सुधारने के लिए किया जाता है। यदि यह जड़ी-बूटी ही विलुप्त हो गई, तो हमारी यह सदियों पुरानी सांस्कृतिक पहचान और लोक-मान्यताएँ भी हमेशा के लिए खत्म हो जाएंगी।
3. प्रकृति की चेतावनी:
जैसे ‘किलमोड़ा’ आज हमारे पहाड़ों से लगभग गायब हो चुका है, वही हाल अब बिरालगानो का हो रहा है। हम केवल वनस्पति नहीं खो रहे, बल्कि पहाड़ों की वह प्राकृतिक संपदा खो रहे हैं जो हमारे पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem) को संतुलित रखती है।
4. आने वाली पीढ़ी के लिए क्या बचेगा?
यह सोचकर भी दुख होता है कि आने वाली पीढ़ी जब इतिहास में इस जड़ी-बूटी के बारे में पढ़ेगी, तो वे हमसे सवाल करेंगे कि जब इसका विनाश हो रहा था तब हम क्या कर रहे थे? अगर आज हमने संकलन (Harvesting) के कड़े नियम नहीं बनाए, तो यह अद्भुत ‘लघु पाठा’ केवल गूगल सर्च और किताबों की तस्वीरों तक सीमित रह जाएगा।
निष्कर्ष:
हमें अपने ‘गुज्जरगानो’ को बचाना होगा। यह केवल ₹10 किलो की जड़ नहीं, बल्कि हमारी परंपरा और पशुधन की सुरक्षा का आधार है। यदि हम इसे आज नहीं बचाएंगे, तो आने वाली पीढ़ी के लिए केवल खाली जंगल बचेंगे।

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