दिनांक: 15 मार्च 2026
स्थान: जाजरकोट, नेपाल
आज मैं अपना एक विशेष अनुभव साझा कर रहा हूँ। करीब सात-आठ साल पहले, जब मैं नेपाल में कॉलेज की पढ़ाई करता था, तब अक्सर सब्जियाँ बेचने बाजार जाया करता था। उसी पुराने अनुभव और अपनी मेहनत की उपज को सही ठिकाने लगाने के लिए, आज मैं फिर से सब्जी बेचने कालेगाउँ से बाजार निकला।
सुबह की तैयारी और प्रस्थान
आज 15 मार्च 2026 है। आज बांदा (बंदगोभी) बेचने के लिए कल शाम को ही, अर्थात् 14 मार्च 2026 के दिन, बंदगोभी काट करके, डोको में भरकर तैयार रखा था। हमारे नेपाल में प्रातः ही मार्केट खुल जाता है, इस वजह से मैं सुबह 3:30 बजे उठा। उठने के बाद मैंने मुँह धोया और बहुत तेज प्यास लगी हुई थी तो पानी पिया। उसके बाद 3:45 पर मैं अपना बंद गोभी का डोको उठाकर चढ़ाई की ओर निकल पड़ा। हनुमान चालीसा सुनते हुए जंगल का रास्ता है, लगभग आधे घंटे की खड़ी चढ़ाई है। उसको चढ़ते हुए मैं तल्लो थाप्ले बाजार तक आया।

सुबह यहाँ देखा कि मैं 4:18 पर पहुँचा तो कोई भी दुकान ओपन नहीं थी। मैं वेट करता रहा।

4:53 पर एक होटल खुला जिसका नाम ‘पूजा खाजा घर’ था। उनको बंदगोभी लेने के लिए पूछा, तो उन्होंने अपने रैक में रखी कुछ बंद गोभी की गांठ दिखाते हुए कहा कि हमारे पास ऑलरेडी है, इसलिए हम नहीं लेंगे। फिर मैंने पूछा कि यह बंद गोभी कहाँ से आया है और किसने लाया इधर बेचने के लिए? तो उन्होंने कहा कि यह कालेगाउँ से आया है।
लगभग 5:00 बजे एक व्यक्ति रायो का साग का डोको लिए हुए ‘श्याला‘ नाम की जगह से आया और उसने दुकान के आगे अपना डोको रख दिया। हम इधर बेंच पर आकर बैठे और साग-सब्जी के बारे में, बाजार के बारे में कुछ देर बातें करते रहे।
धीरे-धीरे बाजार में हलचल बढ़ी—कोई दूध लेकर डेरी जा रहा था, तो कोई मशरूम लेकर ठाँटी बाजार की ओर।
बाजार का संघर्ष और पहली बिक्री
तभी कालेगाउँ से दो महिलाएं भी गोभी लेकर पहुँचीं। प्रतियोगिता बढ़ते देख मैंने फुर्ती दिखाई और पास की एक दुकान पर 6 किलो गोभी बेची। इसके बाद तल्लो थाप्ले के एक होटल में 2 किलो दी और फिर ‘भेटनरीको डाँडो‘ की एक दुकान पर 6 किलो गोभी तौल कर आगे बढ़ा। लेकिन ठाँटी बाजार पहुँचकर निराशा हाथ लगी; कई होटलों और दुकानों पर पूछने के बाद भी किसी ने एक किलो भी गोभी नहीं ली।
घर-घर जाकर सब्जी बेचने का अनुभव
हार न मानते हुए मैं जिला अदालत के रास्ते ‘मथल्नु थाप्ले’ की ओर बढ़ा। सुबह का वक्त था, लोग सोकर उठ ही रहे थे। कई घरों में मनाही सुनने के बाद, अंत में मीट मार्केट के पास एक घर में 2 किलो गोभी बिकी। रेट का कोई ठिकाना नहीं था क्योंकि यहाँ कोई सरकारी मंडी नहीं है। मैंने एक अनुमान से 30 रुपये प्रति किलो बताया।
एक कड़वी सच्चाई: हम किसान खाद, बीज, बंदरों से रखवाली और फिर सिर पर भारी बोझ उठाकर खड़ी चढ़ाई चढ़कर बाजार पहुँचते हैं। दुकानदार हमसे 25-30 रुपये में लेकर उसे 50-60 रुपये में बेचते हैं। बिना मेहनत के बिचौलिए हमसे दोगुना कमा लेते हैं।
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आगे बढ़ते हुए एक अम्मा ने 2 किलो, एक घर में 1 किलो, मथल्नु थाप्ले के एक होटल में 2.5 किलो, एक महिला ने 1.8 केजी और अंत में एक बोर्डिंग स्कूल में 6 किलो गोभी बिकी। और पहाड़ी पर सूर्य की पहली किरण का दर्शन हुआ।

इस तरह मेरी कुल 29 किलो गोभी समाप्त हुई। बंदगोभी बड़े थे इसलिए फिक्स नहीं हो रहे थे कोई केजी में 200 ग्राम ज्यादा हो जाते थे तो मैं उनसे केवल 2 केजी का ही पैसे लेता था।
बोर्डिंग स्कूल में अंतिम बची हुई बंद गोभी बेचकर समाप्त करने के बाद मैं भेटनरी का डांडा से होते हुऎ प्रातः तीन जगह बंद गोभी उधार दिया था अपने पैसे उठाते हुऎ घर की ओर वापसी होने लगा।

आज की कमाई और बाजार का विश्लेषण

आज की कुल कमाई 785 नेपाली रुपये रही। इस भागदौड़ के दौरान ग्राहकों की पसंद भी समझ आई—लोग आजकल हरा धनिया, लिऊरो (न्यूरो), आलू और फूलगोभी की ज्यादा मांग कर रहे हैं।
जाजरकोट बाजार के अलग-अलग हिस्सों में अलग-अलग गांवों का कब्जा है:
- तल्लो थाप्ले: यहाँ श्याला, कालेगाउँ, रातगाउँ और कोल्चर जैसे गांवों की सब्जियाँ आती हैं।
- गैरीखाली और ठाँटी बाजार: यहाँ रिसाङ, दार, पोखरा और बाउनथान का प्रभाव है।
- शान्ति चौतारा: यहाँ इब्र, मटेला और फुलबारी के किसान आते हैं।
वर्तमान चुनौतियां
सड़कें बनने से सुविधा तो हुई है, अब सब्जियाँ कालेगाउँ से गाड़ियों में लदकर डोल्पा तक जा रही हैं। ‘भेरे‘ गांव के किसानों ने बेमौसमी सब्जी से जाजरकोट बाजार पर कब्जा कर लिया है क्योंकि वहां अब गाड़ियों की अच्छी सुविधा है।
लेकिन जहां अभी मैं बागवानी कर रहा हूं। यह क्षेत्र छेडागाड नगरपालिका वार्ड नंबर 10 के अंतर्गत पड़ती है। यह क्षेत्र समुद्र तल से 1800 मीटर की ऊँचाई स्थित है यहां बेमौसमी सब्जियों का अपार संभावना है लेकिन 21 वीं सदी में आज भी संघर्ष कर रहा है।
यहाँ कच्ची सड़क है और गाड़ियां केवल सीजन में ही आती हैं। नींबू, संतरे, माल्टा, निउरो, कीवी, सोयाबीन और मक्का ग्रामीणों से सस्ते रेट में खरीद कर नेपालगंज और सुर्खेत के मार्केट में मुझे दामों पर बेचते हैं।
यहां के ग्रामीण अपनी आवश्यकता की चीज जैसे दाल चावल तेल साबुन इत्यादि को इन्हीं गाड़ियों के जरिए मगाते हैं। बदले में अपने उत्पाद इनको बेचते हैं।
नेपाल में सबसे बड़ी समस्या मंडी और फिक्स रेट का न होना है। दुकानदार 5 किलो 500 ग्राम सब्जी को सिर्फ 5 किलो ही मानते हैं, ऊपर के 500 ग्राम का पैसा किसान को नहीं मिलता।
मेहनत किसान की, और मुनाफा बिचौलियों का—नेपाल के कृषि क्षेत्र की यह विडंबना आज भी बरकरार है।

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