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सागर बुढा |

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सिंगारु नृत्य: जाजरकोट का वो रहस्यमयी नाच, जहाँ पुरुष पहनते हैं साड़ी!

8 March 2026 by सागर बुढा (Sagar Budha Vlogs) Leave a Comment

पारंपरिक वेशभूषा में थिरकते सिंगारू नृत्य के कलाकार।

सुरम्य पहाडियों से घिरे उत्तर में कुशे चाखुरे पाटन (बुग्याल) तथा दक्षिण में कल-कल बहती भेरी नदी -आहा ! यह दृश्य कितना मनमोहक है। प्राकृतिक सुंदरता से भरपूर है कर्णाली प्रदेश का यह जिला जाजरकोट। न केवल अपनी वादियों के लिए बल्कि अपनी समृद्ध लोक संस्कृति के लिए भी जाना जाता है।

जाजरकोट की इन्हीं जीवंत लोक संस्कृतियों में से एक है यहाँ का सुप्रसिद्ध ‘सिंगारु नृत्य‘। चूँकि मैं जाजरकोट का ही निवासी हूँ, इसलिए बचपन से ही गाँव के मेलों, शादी-ब्याह और स्थानीय उत्सवों में इस नृत्य की गूँज मेरे भीतर बसी हुई है। इसकी ऊर्जा और सादगी को करीब से महसूस करना हमेशा से ही बड़ा सुखद अनुभव रहा है।


“आज मेरा मन हुआ कि क्यों न इस अनूठी परंपरा का जादू आप सभी के साथ साझा करूँ!”

भेरी नदी के किनारे बसे रुकुम, जाजरकोट और सल्यान की यह एक अत्यंत प्राचीन और गौरवशाली लोक विरासत है। जैसे किसी सब्जी में आप दुनिया के सबसे स्वादिष्ट मसाले डाल दें, लेकिन अगर उसमें नमक न हो, तो सारा स्वाद फीका रह जाता है—ठीक वैसे ही, इन तीनों जिलों में ‘सिंगारु नृत्य‘ के बिना हर उत्सव अधूरा और बेजान सा लगता है। इसके बिना यहाँ का कोई भी जश्न अपना पूरा रंग नहीं बिखेर पाता।

बिना नमक के सब्जी’ की तरह ही, जाजरकोट के मेलों का स्वाद इस नृत्य के बिना अधूरा है।


तो चलिए, आज मैं आपको ‘सिंगारु‘ की बारीकियों से रूबरू करवाता हूँ और वीडियो के माध्यम से इसकी एक झलक पेश करता हूँ। साथ ही, मेरे उन भारतीय मित्रों के लिए जो इस संस्कृति को करीब से देखना चाहते हैं, मैंने लेख के अंत में ‘भारत से जाजरकोट’ पहुँचने का पूरा रास्ता और जरूरी जानकारी भी साझा की है।

Table of Contents

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  • सिंगारु नृत्य की मुख्य विशेषता
  • ऐतिहासिक एवं पौराणिक संदर्भ
  • सिंगारू नृत्य का सांस्कृतिक महत्व
  • सिंगारु नृत्य की विशिष्ट वेशभूषा
  • सिंगारु नृत्य में बजाए जाने वाले वाद्य यंत्र
  • सिंगारू नृत्य में गाए जाने वाले गीतों के बोल
  • यह नृत्य कैसे किया जाता है?
  • सिंगारू नृत्य का समापन
  • जाजरकोट को कैसे पहुंचे?
    • बहराइच स्टेशन ही क्यों?
    • अगर बहराइच की सीधी ट्रेन न मिले तो?
  • आसान यात्रा प्लान (Step-by-Step)
  • किराया भाड़ा
  • वैकल्पिक हवाई मार्ग
  • रहने खाने की व्यवस्था
  • मेरी तरफ से मुख्य सलाह
  • यहां घूमने के लिए कितना बजट की आवश्यकता पड़ेगी
  • निष्कर्ष

सिंगारु नृत्य की मुख्य विशेषता

इस नृत्य की मुख्य विशेषता यह है कि पुरुष कलाकार महिलाओं की लाल रंग की साड़ी (जिसे फरिया कहते हैं) पहन कर तथा कमर में पटुकी बांध कर नृत्य करते हैं। ऊपर शर्ट होता है और सिर पर नेपाली गौरवमयी ढाका टोपी पहने हुए, दाहिने हाथ में रुमाल होता है।

ऐतिहासिक एवं पौराणिक संदर्भ

कहा जाता है कि इस नृत्य की जड़े धार्मिक एवं पौराणिक कथाओं से जुड़ी है। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार पौराणिक समय में भगवान श्री कृष्ण एवं गोपियों के बीच के प्रेम को दर्शाने के लिए पुरुषों ने महिलाओं के वस्त्र धारण करके नृत्य किया था। समय के साथ यह सामाजिक एवं लोक नृत्य बन गया।

सिंगारू नृत्य का सांस्कृतिक महत्व

सिंगारू नृत्य को केवल मनोरंजन के लिए नहीं किया जाता है बल्कि यह नृत्य भेरी और राप्ती क्षेत्र की पहचान है। सामुदायिक एकता का प्रतीक माने जाने वाला यह नृत्य पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तांतरित होता आ रहा है। नृत्य के दौरान गाए जाने वाले गीतों में अक्सर समाज के सुख दुख, प्रेम और प्रकृति का वर्णन होता है।

सिंगारु नृत्य की विशिष्ट वेशभूषा

जाजरकोट के सिंगर में कपड़ों का चयन विशेष रूप से किया जाता है।

  • लाल साड़ी-  यहां के कलाकार अक्सर गहरे लाल रंग की साड़ी पहनते हैं।
  • ढाकाटोपी – यहां नेपाल का गौरवमयी राष्ट्रीय पहचान है।
  • शर्ट – नाचने वाले नर्तक हमेशा ऊपर सफेद शर्ट पहने रहते हैं यह उनकी सिंगारू नाच की वेशभूषा है।

सिंगारु नृत्य में बजाए जाने वाले वाद्य यंत्र

सिंगारू की धड़कन: मादल और कुरकुटी की जुगलबंदी, जो पैरों को थिरकने पर मजबूर कर देती है।

सिंगारू नृत्य पूरी तरह से पारंपरिक संगीत पर आधारित होता है इसलिए इसमें निम्नलिखित वाद्य यंत्रों को बजाया जाता है।

  • मादल – सिंगारू नृत्य में यह प्रमुख वाद्य यंत्र है इसे सिंगारु नृत्य का धड़कन कहते हैं।
  • बांसुरी – सिंगारु नृत्य में मधुर धुन के लिए बांसुरी बजाया जाता है।
  • झांझ मंजीरा– लय को बनाए रखने के लिए इसे बजाया जाता है।
  • ट्यामको – नगाड़े जैसे दिखने वाला लेकिन अति छोटा वाद्य यंत्र है इसे भी बजाया जाता है इससे नाचने वालों के शरीर में पूरा जोश भर जाता है। इसे यहां के लोग कुरकुटी भी बोलते हैं

सिंगारू नृत्य में गाए जाने वाले गीतों के बोल

गायक टोली जो अपने ‘टुका’ और सुरीली आवाज़ से पूरे माहौल में जान फूंक देती है।

सिंगारू नृत्य में गाए जाने वाले गीतों के बोल में अक्सर इन विषयों का वर्णन होता है

  • प्रकृति: भेरी नदी का बहाव यहां के विभिन्न धार्मिक स्थल रमणीय पर्यटन स्थल गांव ऐतिहासिक स्थल विभिन्न नदी नाले ऊंचे पहाड़ हिमालय यहां की हरियाली।
  • इतिहास: जाजरकोटी, रुकमेली और सल्यानी राजाओं के वैभव और पुराने समय के युद्धों की कहानियाँ।
  • सामाजिक जीवन: परदेस गए पति का इंतज़ार कर रही पत्नी की पीड़ा (बिरह)। प्रेम, बिछोड (प्रेम टूटना) इत्यादि का वर्णन मिलता है।

यह नृत्य कैसे किया जाता है?

सिंगारू नृत्य के लिए नर्तक कलाकार गोल घेरे में होते हैं। इन्हीं के बीच में मादल बजाने वाला एवं कुरकुटी बजाने वाला साथ में होता है।  घेरे के बाहर झाँझ मजीरा बजाने वाला जैसे-जैसे वह नाचते हैं उन्हीं के साथ झांझ मजीरा बजाते हुए गोल-गोल घूमता है।

टूका गायन करने वाले बडे बुजुर्ग बाहर होते हैं। उनके हाथ में मुरली होती है। जैसे ही वे टूका गाकर खत्म करते हैं खुद मुरली बजाते हैं। इसलिए यह नृत्य कैसे होता है उसका एक रौनक देखें।

  • मादल की उठान: नृत्य की शुरुआत मादल की बहुत ही धीमी और मधुर लय से होती है। इसे ‘ताल उठाना’ कहते हैं, जो धीरे-धीरे पूरे माहौल को संगीतमय बना देती है।
  • टुका गायन (बिना बाजों के): जब नृत्य अपनी लय में होता है, तब अचानक सारे वाद्ययंत्र शांत हो जाते हैं। उस सन्नाटे में किनारे बैठे अनुभवी गायक अपनी बुलंद आवाज में ‘टुका’ (गीत की पंक्ति) गाते हैं। इस समय कोई भी बाजा नहीं बजता, केवल शब्दों का जादू होता है।
  • मुरली और बाजों का शोर: जैसे ही गायक का टुका खत्म होता है, बांसुरी (मुरली) एक लंबी तान छेड़ती है और फिर अचानक मादल और कुरकुटे एक साथ खड़कने लगते हैं।
  • कुरकुटे की गूँज: कमर में बंधा छोटा नगाड़ा यानी ‘कुरकुटे’ जब “कुरकुटी-कुरकुटी-कुरकुटी” की तेज आवाज निकालता है, तो नर्तकों के पैरों में मानो बिजली दौड़ जाती है।

सिंगारू नृत्य का समापन

सिंगारु नित्य का समापन बहुत ही खास तरीके से किया जाता है। अंत में कोई भी टूका न गाकर बल्कि मादल और अन्य वाद्य यंत्रों को एक साथ में बजाकर एक लयबद्ध तरीके से इस नृत्य को विराम दिया जाता है।

आप इसका आनंद लेना चाहते हैं तो पौष 15 गते अर्थात 29 से 30 दिसंबर को हर साल जाजरकोट जिले के थापल्या चौर नामक स्थान पर भव्य रमाईली मेला लगता है। आप यहां आकर इन तीनों जिलों की विभिन्न संस्कृति का आनंद ले सकते हैं।

इसके अलावा इन तीनों जिलों में लगने वाले विभिन्न छोटे-बड़े मेलों में यहां की सांस्कृतिक कार्यक्रम का मजा ले सकते हैं।

“जाजरकोट की यह सांस्कृतिक विरासत जितनी पुरानी है, यहाँ का इतिहास भी उतना ही गौरवशाली है। सिंगारु नृत्य की तरह ही यहाँ का जाजरकोट दरबार भी अपनी अद्भुत वास्तुकला और ऐतिहासिक महत्व के लिए प्रसिद्ध है, जिसे आपको एक बार जरूर जानना चाहिए।”

जाजरकोट को कैसे पहुंचे?

यदि आप भारत से आना चाहते हैं तो नजदीकी बॉर्डर बहराइच (रुपईडीहा) है।

  • रेलवे मार्ग – भारत के किसी भी शहर (जैसे दिल्ली, मुंबई, कोलकाता) से आप सीधे बहराइच (BRK) स्टेशन तक की ट्रेन टिकट बुक करें।

बहराइच स्टेशन ही क्यों?

क्योंकि यह भारत-नेपाल बॉर्डर (रुपईडीहा) के सबसे करीब है। बहराइच स्टेशन से बॉर्डर की दूरी मात्र 55 किलोमीटर है। यहाँ से ऑटो या बस से आप 1-1.5 घंटे में बॉर्डर पहुँच जाएंगे।

अगर बहराइच की सीधी ट्रेन न मिले तो?

तब आप लखनऊ (LKO/LJN) स्टेशन के लिए ट्रेन लें।

  • ​लखनऊ एक बहुत बड़ा जंक्शन है और पूरे भारत से जुड़ा है।
  • ​लखनऊ से आपको रुपईडीहा बॉर्डर के लिए सीधी बसें (यूपी रोडवेज) मिल जाएंगी।
  • दूरी: लखनऊ से बॉर्डर लगभग 200 किलोमीटर है, जिसमें बस से करीब 4-5 घंटे लगते हैं।

आसान यात्रा प्लान (Step-by-Step)

  • स्टेप 1: अपनी ट्रेन से बहराइच या लखनऊ उतरें।
  • स्टेप 2: स्टेशन के बाहर से बस या प्राइवेट टैक्सी पकड़ें और “रुपईडीहा बॉर्डर” पहुँचें। (कोशिश करें कि दोपहर 1-2 बजे तक बॉर्डर पहुँच जाएं)।
  • स्टेप 3: पैदल या रिक्शा से सीमा पार करके नेपाल के नेपालगंज शहर में दाखिल हों। (यहाँ कोई वीजा नहीं लगता, बस अपना आधार कार्ड साथ रखें)।
  • स्टेप 4: नेपालगंज से कोहलपुर जाएँ (सिर्फ 30 मिनट का रास्ता है)।
  • स्टेप 5: कोहलपुर बस पार्क से जाजरकोट के लिए बस या शेयरिंग जीप पकड़ें।

किराया भाड़ा

  • लखनऊ से बॉर्डर की बस: ₹300 – ₹350
    बहराइच
  • बहराईच से बॉर्डर का ऑटो/बस: ₹80 – ₹120
    नेपालगंज
  • बॉर्डर से कोहलपुर का बस किराया (नेपाली रुपय में) रु 70
  • कोहलपुर से जाजरकोट 1000 नेपाली रूपये हर व्यक्ति का भाडा।

वैकल्पिक हवाई मार्ग

आप भारत के किसी भी शहर से लखनऊ चौधरी चरण सिंह अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा (Chaudhary Charan Singh International Airport) इसे आमतौर पर अमौसी हवाई अड्डा भी कहते हैं। यहां से आप बॉर्डर तक ओला उबर टैक्सी बुकिंग करके भी आ सकते हैं।

अन्यथा आप डायरेक्ट बस में भी आ सकते हैं जो कि उत्तर प्रदेश परिवहन निगम की बसे चलती है। नेपालगंज में हवाई अड्डा तो है लेकिन वह डोमेस्टिक है यहां से प्लेन नेपाल के विभिन्न जगहों पर ही उड़ान भरती है। जाजरकोट आने के लिए मुख्य मार्ग सड़क ही है।

इसके अलावा आप अपना वाहन लेकर भी आ सकते हैं नेपालगंज कोलपुर से जाजरकोट की दूरी 160 किलोमीटर है यहां आने में आपको नेपालगंज से 5 से 6 घंटे लग जाएंगे क्योंकि पहाड़ी मार्ग है।

रहने खाने की व्यवस्था

जाजरकोट में विभिन्न साफ सुथरे होटल एवं लॉज है यहां पर आपको 500 से 1000 रुपए प्रत्येक रात का किराया है। आप नेपाली सादा खाना खाते हैं तो 180 से 200 में यहां खाना खिला देते हैं बाकी आपके बजट पर निर्भर करता है कि आप कौन सा खाना खाना चाहते हैं चिकन खाना और मटन खाना 350 से स्टार्ट होता है। मैं बजट ट्रैवलर हूं इसलिए मैं बजट की ही बात करता हूं सादा खाना दाल भात रोटी तरकारी से पेट भर जाता है स्वादिष्ट रहता है।

इसके अलावा यहां पर आप भेरी नदी के मच्छी का स्वाद ले सकते हैं। ढिमे दमदाला के संतरो का स्वाद भी

मेरी तरफ से मुख्य सलाह

  • अपनी करेंसी बॉर्डर के पास से ही चेंज कराकर लाइएगा क्योंकि यहां पर इस तरह की कोई सुविधा नहीं है। बॉर्डर में करेंसी चेंज करते समय इधर नेपालगंज के साइड में आधिकारिक मनी एक्सचेंज पर ही जाएगा रास्ते में बैठे होते हैं बहुत सारे लोग नोटों की बंडल पकड़े हुए इनके पास मत जाइएगा
  • वैसे तो नेपाल में आजकल भीमपे के जरिए भी पेमेंट कर सकते नेपाल के फोनपे में लेकिन यह सुविधा मुख्य शहरों में ही उपलब्ध है जाजरकोट में मैने अभी यह सुविधा नहीं देखा। भारत के एसबीआई का कार्ड नेपाल में चल जाता है लेकिन उसके लिए आपको इंटरनेशनल पेमेंट वहां से एक्टिवेट कराकर लाना पड़ता है।
  • वैसे आप दिसंबर के महीने में मेला देखने आ रहे हैं तो अपने साथ में गरम जैकेट और गर्म कपड़े जरूर लेकर आए हैं क्योंकि जाजरकोट पहाड़ी इलाका है यहां पर ठंड ज्यादा होती है।

यहां घूमने के लिए कितना बजट की आवश्यकता पड़ेगी

यदि आप मुझ जैसे बजट ट्रैवलर हैं और अकेले हैं और रुपईडीहा बॉर्डर से 500 किलोमीटर के दायरे में तो आपको 10 हजार से 15 हजार रुपए काफी है।

निष्कर्ष

वास्तव में यह नृत्य हमारी शान है। गांव के छोटे-बड़े पर्व हो, मेले हो, शादी ब्याह हो, दशहरा एवं त्योहार हो हर जगह इस नृत्य को किया जाता है। और तो और दीपावली के समय सिंगारु गीत ना सुनने वाला शायद ही कोई होगा रुकुम, सल्यान और जाजरकोट में स्थानीय एफएम रेडियो में भी यही बजता है। तो लोगों को लगता है कि अब त्यौहार आ गया है।

जाजरकोट की भौगोलिक स्थिति और इसके समृद्ध इतिहास के बारे में अधिक जानकारी के लिए आप विकिपीडिया पर जाजरकोट का आधिकारिक पेज देख सकते हैं।”

Filed Under: मेरा अनुभव Tagged With: कर्णाली प्रदेश (Karnali Province), जाजरकोट (Jajarkot), नेपाली लोक संस्कृति (Nepali Folk Culture), सिंगारु नृत्य (Singaru Dance)

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नमस्ते, मैं सागर। एक साधारण सा यात्री जिसे नेपाल के पहाड़ों और खेतों से लगाव है। sagarbuda.com पर मैं बस अपनी यात्राओं के अनुभव और खेती-किसानी की कुछ छोटी-मोटी बातें साझा करने की कोशिश करता हूँ और पढ़ें....

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