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सागर बुढा |

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बागवानी, कृषि और नेपाल यात्रा

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मेरे बारे में:

पुरोला की पल्लेदारी से तारे पातल की मिट्टी तक

“रेगिस्तान की धूप देखी, अब पहाड़ों की छांव में अपनी जड़ों को सींच रहा हूँ।”


सागर, ग्राम तारे पातल।

नमस्ते, मैं हूँ सागर।

आज जब मैं अपने गाँव ‘तारे पातल’ की 1800 मीटर की ऊंचाई पर खड़ा होकर हिमालय की इन शांत वादियों को देखता हूँ, तो मेरा मन बरसों पीछे चला जाता है। मेरा सफर किसी मखमल की सेज पर नहीं, बल्कि पहाड़ के उन कठिन रास्तों पर बीता है, जहाँ ज़िंदा रहने के लिए हर दिन एक जंग लड़नी पड़ती थी।

वो दिन जब कंधों पर बोझ था और दिल में पढ़ाई की ललक

मेरी शुरुआती पढ़ाई राजकीय प्राथमिक विद्यालय, मखना (कक्षा 1-5) में हुई। उसके बाद मैं राजकीय कन्या जूनियर हाई स्कूल, छीबाला (कक्षा 6-8) पहुँचा। जब मैं 9वीं और 10वीं के लिए राजकीय इंटर कॉलेज, पुरोला गया, तो जिंदगी के हालात और भी कड़े हो गए थे।

मुझे आज भी पुरोला का वो बाजार और उसकी तंग गलियां अच्छी तरह याद हैं। अपने घर का चूल्हा जलाने और अपनी पढ़ाई का खर्च उठाने के लिए मैं वहाँ पल्लेदारी किया करता था। कंधों पर भारी बोरियाँ होती थीं और शरीर पसीने से तरबतर होता था, लेकिन मन में एक ही बात रहती थी कि मुझे पढ़ना है और कुछ करना है। बाद में, अपनी सेकंडरी शिक्षा मैंने नेपाल के श्री त्रिभुवन हायर सेकंडरी स्कूल, जाजरकोट से पूरी की।

रेगिस्तान की वो चिलचिलाती धूप और 6 साल का संघर्ष

किस्मत मुझे और भी दूर ले गई—सात समंदर पार UAE (दुबई)। वहां के रेगिस्तान में मैंने अपने जीवन के 6 अनमोल साल बिताए। पैसा तो मिल रहा था, लेकिन दुबई की उस तपती गर्मी में मुझे अक्सर पुरोला की वो शामें और जाजरकोट की वो ठंडी हवाएं याद आती थीं। सच कहूँ तो, वहां रहते हुए मैंने पैसा तो कमाया, लेकिन अपनी जड़ों के लिए मेरी रूह हमेशा तरसती रही।

सागर, दुबई संघर्ष के दिन।

वापसी अपनी जड़ों की ओर: ‘तारे पातल’ का सपना

एक दिन मैंने तय किया कि अब बहुत हुआ दूसरों के लिए पसीना बहाना। अब मैं अपनी मेहनत और अपनी जवानी अपने गाँव, अपनी मिट्टी के काम लगाऊंगा। लोग हैरान थे कि मैं दुबई की कमाई छोड़कर वापस पहाड़ क्यों जा रहा हूँ, लेकिन मेरा दिल जानता था कि मेरा सुकून कहाँ है।

आज मैं अपने गाँव तारे पातल में हूँ। यहाँ 1800 मीटर की ऊंचाई पर मैं आधुनिक और पारंपरिक खेती के मेल से अपनी जमीन को संवार रहा हूँ। मैं यह साबित करना चाहता हूँ कि अगर हम अपनी मिट्टी को प्यार दें और मेहनत करें, तो वह हमें कभी खाली हाथ नहीं रहने देगी।

Sgarbudha.com के जरिए मेरी एक छोटी सी कोशिश:

  • खेती का असली अनुभव: यहाँ मैं वही बातें लिखता हूँ जो मैंने मिट्टी खोदकर और पौधे रोपकर सीखी हैं।
  • हिमालय का सफरनामा: मेरे साथ आप उन रास्तों पर चलेंगे जहाँ सुकून और सादगी बसती है।

“पहाड़ का पानी और पहाड़ की जवानी अब पहाड़ के ही काम आएगी।”

तारे पातल की इन ऊंचाइयों से, मेरे इस जीवन-संघर्ष से जुड़ने के लिए आपका हृदय से आभार।

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लेखक के बारे में

नमस्ते, मैं सागर। एक साधारण सा यात्री जिसे नेपाल के पहाड़ों और खेतों से लगाव है। sagarbuda.com पर मैं बस अपनी यात्राओं के अनुभव और खेती-किसानी की कुछ छोटी-मोटी बातें साझा करने की कोशिश करता हूँ और पढ़ें....

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