
नेपाल के मानचित्र पर कर्णाली प्रदेश अपनी प्राकृतिक सुंदरता के लिए जाना जाता है, लेकिन इसी प्रदेश के जाजरकोट जिले में एक ऐसी ऐतिहासिक धरोहर है जो सदियों के उतार-चढ़ाव की गवाह रही है। दक्षिण में सुरीली आवाज़ में बहती भेरी नदी और रुकुम के चौरजहारी का विहंगम दृश्य, उत्तर में कुशे पाटन की मखमली हरियाली, और पूर्व में चांदी की तरह चमकता सिस्ने हिमालय—इन सबके बीच खलंगा के ‘पीपल डाँडा’ की ऊँची चोटी पर विराजमान है सफेद और भव्य जाजरकोट दरबार। यह सिर्फ एक इमारत नहीं, बल्कि बाइसे-चौबिसे काल के पराक्रम का जीवंत प्रमाण है।
जाजरकोट राज्य का ऐतिहासिक उदय
इतिहास के पन्नों को पलटें तो पता चलता है कि बाइसे राज्यों में जाजरकोट एक अत्यंत शक्तिशाली और सामरिक रूप से महत्वपूर्ण राज्य था। इस राज्य की नींव राजा जगतिसिंह मेदिनी वर्मा ने सन् 1455 (विक्रम संवत 1512) में रखी थी। शुरुआत में जाजरकोट की राजधानी ‘जगतिपुर’ हुआ करती थी।
राजधानी के स्थानांतरण के पीछे एक दिलचस्प लोककथा जुड़ी है। राजा विजय सिंह के समय उनका प्रिय घोड़ा अक्सर चरने के लिए जगतिपुर से खलंगा के ‘पीपल डाँडा’ की ओर भाग आता था। जब राजा के उत्तराधिकारियों ने गौर किया कि घोड़ा बार-बार इसी स्थान को चुनता है, तो उन्होंने सुरक्षा और रणनीतिक दृष्टिकोण से इसे उत्तम माना। अंततः 16वीं शताब्दी में राजधानी को जगतिपुर से हटाकर इसी पहाड़ी की चोटी पर लाया गया, जहाँ आज यह दरबार खड़ा है।
लाल और सफेद दरबार: वास्तुकला का बेजोड़ संगम
जाजरकोट की पहचान यहाँ के दो प्रमुख दरबारों से है, जो अलग-अलग कालखंडों की कहानियाँ सुनाते हैं:
- रातो दरबार (लाल दरबार): इस ऐतिहासिक महल का निर्माण सन् 1768 में जाजरकोट के छठे राजा हरि शाह ने करवाया था। राजा हरि शाह, गोरखा के राजा पृथ्वी नारायण शाह के ‘मीत’ (मित्र) थे। निर्माण के समय यह भव्य महल सात मंजिला था, जिसकी बनावट और नक्काशी उस दौर की श्रेष्ठ वास्तुकला को दर्शाती थी।
- सेतो दरबार (सफेद दरबार): लाल दरबार के निर्माण के ठीक 27 साल बाद (सन् 1795), राजा इन्द्रनारायण शाह ने शासन की बढ़ती जरूरतों को देखते हुए एक और महल की आवश्यकता महसूस की। उन्होंने लाल दरबार के पास ही सबसे ऊँचे स्थल का चयन किया और ‘सेतो दरबार’ का निर्माण करवाया।
इन महलों के निर्माण के लिए विशेष रूप से भक्तपुर से प्रसिद्ध शिल्पकार ‘नाक्चे’ को बुलाया गया था। स्थानीय लोकगाथाओं के अनुसार, इस दरबार की ईंटें रुकुम के चौरजहारी से स्थानीय जनता द्वारा मानव-श्रृंखला बनाकर जाजरकोट तक पहुँचाई गई थीं।
नेपाल के एकीकरण में योगदान और ऐतिहासिक संधियाँ
जाजरकोट का इतिहास नेपाल के एकीकरण से अटूट रूप से जुड़ा है। राजा हरि शाह और पृथ्वी नारायण शाह के बीच 7 माघ 1825 (वि.सं.) को हुई ऐतिहासिक संधि इसी लाल दरबार से संचालित की गई थी।
- सैन्य पराक्रम: प्रथम विश्वयुद्ध में जाजरकोट के 150 वीर सैनिकों ने हिस्सा लिया था।
- नया नेपाल: जब बाँके, बर्दिया, कैलाली और कञ्चनपुर को ‘नया नेपाल’ के रूप में देश में वापस मिलाया गया, तब 800 जाजरकोटी सैनिकों ने अदम्य साहस का परिचय दिया था।
- राणा और शाह वंश से संबंध: जाजरकोट के राजाओं का वैवाहिक संबंध काठमांडू के राजपरिवारों से रहा। पहले राणा प्रधानमंत्री जंग बहादुर राणा ने अपनी दो बेटियों का विवाह जाजरकोट के राजा से एक ही लग्न में करवाया था।
गौरवशाली वस्तुएँ: जो आज ओझल हैं
समय की धूल ने इस दरबार की कई यादों को धुंधला कर दिया है। तिब्बत युद्ध (ताक्लाकोट) के दौरान जीती गई चमड़े की तोप और प्राचीन हथियार आज काठमांडू के राष्ट्रीय संग्रहालय में रखे हैं। पृथ्वी नारायण शाह द्वारा उपहार में दी गई शक्ति-प्रतीक तलवार आज भी जगतिपुर के मंदिर में पूजी जाती है। हालाँकि, दरबार के भीतर की कई प्राचीन मूर्तियाँ और कलाकृतियाँ गृहयुद्ध और देखरेख के अभाव में गायब हो गईं या अन्य मंदिरों में स्थानांतरित कर दी गईं।
प्राकृतिक आपदाओं का प्रहार
इस धरोहर ने प्रकृति के कई क्रूर प्रहार सहे हैं:
- 1934 का महाभूकंप: इसने सात मंजिला भव्यता को खंडहर में बदल दिया, जिसके बाद इसे मात्र 4 मंजिला ही बनाया जा सका।
- 2023 का जाजरकोट भूकंप: हाल ही में आए 6.4 तीव्रता के भूकंप ने दरबार की संरचना को बहुत अधिक क्षति पहुँचाई है। आसपास की कई ऐतिहासिक संरचनाएँ अब मलबे के ढेर में तब्दील हो चुकी हैं।
संरक्षण की अनिवार्य आवश्यकता: एक निष्कर्ष
आज जाजरकोट दरबार अपनी बदहाली पर आंसू बहा रहा है। नेपाल सरकार के 100 प्रमुख पर्यटन स्थलों में शामिल होने के बावजूद, इसके पुनरुद्धार के लिए आवश्यक 13 करोड़ रुपये का बजट सरकारी फाइलों में दबा हुआ है।
सुझाव और समाधान:
- दरबार को प्रशासनिक कार्यालय के बजाय एक जीवंत संग्रहालय के रूप में विकसित किया जाना चाहिए।
- पुरातत्व विभाग को इसके ‘पुराने स्वरूप’ की रक्षा करते हुए भूकंप-रोधी तकनीक के साथ इसका पुनर्निर्माण करना चाहिए।
- रानी के स्नान कुंड और दरबार के कलात्मक द्वारों का पुनः निर्माण कर इसे कर्णाली का मुख्य पर्यटन हब बनाया जाना चाहिए।
यदि आज हमने इन 250 साल पुरानी दीवारों को नहीं बचाया, तो आने वाली पीढ़ियाँ सिर्फ किताबों में ही जाजरकोट के इस गौरवशाली इतिहास को पढ़ पाएंगी।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
- जगतिपुर से राजधानी हटने के बाद सामान्य राजकाज यहीं से चला।
- जाजरकोट के राजा हरि शाह एवं उनके पुत्र गजेन्द्र शाह और गोरखा के राजा पृथ्वीनारायण शाह के बीच १८२५ वि.सं. माघ ७ गते हुई संधियों के साथ-साथ, उसके बाद की अन्य संधियों का संचालन भी इसी रातो दरबार से हुआ था।
सेतो दरबारबाट गरिएका महत्वपूर्ण ऐतिहासिक कामहरू
- प्रथम विश्वयुद्धमा १५० जना जाजरकोटी सहभागिता।
- नयाँ नेपाल बन्दाको बखतमा बाँके, बर्दिया, कैलाली, कन्ञ्चनपुरलाई नयाँ नेपालको रुपमा विशाल नेपालभित्र गाभ्ने कार्यमा ८०० जाजरकोटी सेनाले गरेको योगदान।
- पृथ्वी नारायण शाहले नेपाल एकीकरण गर्ने समयमा नेपाल एकीकरणमा जाजरकोटी सेनाको योगदान।
- तिब्बतमा बहादुर शाह बन्धक परेको बेला उनको उद्धार गर्न जाजरकोटी सेना परिचालन भएको।
- पहिलो राणा प्रधानमन्त्री जंगबहादुर राणाकी दुइ छोरीहरु जगतकुमारी र दिर्घकुमारीको एकै लगनमा जाजरकोटी राजासंग गरेको विवाह।
- तत्कालिन श्री ५ रणबहादुर शाह की छोरी दुर्गाकुमारी शाहसंग जाजरकोटी राजा दीपनारायण शाहले गरेको विवाह।
जाजरकोट राज्यका समयमा शासन पद्धति कस्तो थियो?
जाजरकोट राज्यका समयमा एक जना मन्त्रि हुन्थे। ति मन्त्रि राज्यमन्त्रीका रुपमा काम गर्दथे। राज्यमन्त्रीका रुपमा काम गर्नेलाई काजि भनिन्थ्यो। राज्यमा काम गर्नका लागि तोकिएका मन्त्रि अर्थात काजी तथा उनका परिवार जाजरकोट दरबारकै छेउमा बनेका मौलिक पुराना संरचनाहरुमा बस्थे। त्यति बेलाका कजिहरुको विशेष सुविधाको व्यवस्था तथा पूर्ति जनता बताई उठाइएको कर बाट गरिन्थ्यो।.
विभिन्न समयमा जाजरकोट दरबारलाई भूकम्पले पुर्याएको क्षति र पुनः निर्माण
१ – १९९० सालको भूकम्प
- आज भन्दा ९० साल अघि १९९० साल माघ २ गते नेपाल र भारत केन्द्रबिन्दु भएर गएको ८ म्यग्निच्युडको महाविनाशकारी भूकम्पले यस दरबारलाइ पूर्ण रुपमा भत्काएको थियो।
- ९० बर्ष अघिको उक्त भुइचालोलाई दरबारलाई क्षति पुर्याउने महा विपद्क रुपमा जाजरकोट वासीले लिने गरेका छन्।
- साततले दरबारलाई ४ तलामा पुनःनिर्माण गरियो।
- यो दरबार पुनः निर्माणका लागि भक्तपुरबाट नेवार समुदायका इन्जीनियर बोलाइएको थियो।
२ – २०४५ सालको भूकम्प
- २०४५ साल भदौ ५ गते विहान ५ बजे नेपालको उदय्पर केन्द्रबिन्दुभइ गएको ६.६ रेक्टर स्केलको भूकम्पले ४० सेकेन्डमै पुरै नेपाल हल्लाएको थियो।
- यस भूकम्पले जाजरकोट दरबारको पश्चिमी भागमा क्षति पुगी भत्किएको थियो।
- यसलाई २०५१ सालमा पुनः निर्माण गरिएको थियो।
३- २०७२ सालको भूकम्प
- २०७२ साल बैसाख १२ गते दिउसो ११ बजेर ५६ मिनेटमा गोरखा जिल्लाको बारपाक आसपास केन्द्रबिन्दु बनाएर ७.६ रेक्टर स्केलको भूकम्पले गएको थियो।
- उक्त भूकम्पले गोरखा, सिन्धुपाल्चोक, काठमाडौं, काभ्रे, दोलखा, धादिङ, मकवानपुरलगायत १४ जिल्लामा जनधन को धेरै क्षति गरेको थियो।
- २०७२ सालको भूकम्पले जाजरकोट दरबारलाई कुनै क्षति पुर्याएन।
४ – २०८० सालको भूकम्प
- २०८० साल कार्तिक १७ गते मध्यराति ११ बजेर ४७ मिनेटमा जाजरकोट रामीडाँडा केन्द्रबिन्दु भएर ६.४ रेक्टर स्केलको गएको थियो।
- यस भूकम्पले जाजरकोट, रुकुम र सल्यान जिल्लामा अधिक क्षतिका साथै कर्णालीका अधिकांश जिल्लालाई पनि क्षति पुर्याएको छ।
- यस भूकम्पले जाजरकोट दरबारलाई ठुलो क्षति पुगेको छ।
- यस पटकको भूकम्पले जाजरकोट दरबारकै समयमा बनेका आसपासका संरचना तहस नहस बनेका छन्।
यो दरबारको अवस्था कस्तो छः?
- दरबारमा प्रवेशद्वारको अगाडी रहेको दुइवटा सिंहले अगाडिका खुट्टा उचालेर आक्रोश व्यक्त गरेको तस्विर झल्किने कलात्मक गेट २०३५ सालमा भत्किएको थियो।
- जाजरकोट दरबारमा प्रयोग भएका झ्यालको कला र स्वरूप हेर्दा शुरुकै स्वरुपमा निर्माण भएको देखिन्छन सरकारले देखरेखको राम्रो व्यवस्था गर्न न सक्दा अहिले यसका धेरै मौलिक स्वरुपहरुको अस्तित्व मेटिएको छ।
- यो दरबार जिर्ण अवस्थामा छ। दरबार पुनःनिर्माणका लागि जिल्लाले पटक पटक पत्र पठाउँदा पनि अर्थमन्त्रालयले बजेट निकासा गर्दैन। यो दरबार पुनः निर्माण गर्न झन्डै १३ करोड रुपियाँ लाग्छ ।
- दरबारको वरपरी भव्य महलको बीचमा रानिहरुले नुहाउने तलाउको अहिले कुनै पनि नामो निसान छैन।
- यो दरबार पुरातत्व विभागमा दर्ता भएको भए पनि यसको रेखदेख र संरक्षणमा कसैको चासो छैन।
जाजरकोट दरबारलाई संरक्षण कसरि गर्ने ?
- जाजरकोट दरबारको मौलिकता पुरातात्विक महत्व एवं इतिहास संरक्षित गर्नको लागि पुरानै स्वरुपमा भुकम्प्प्रतिरोधि निर्माण गर्न जरुरि छ।
- दरबारको मौलिक स्वरूप जोगाउँदै समग्र कर्णालीको लागि मुख्य पर्यटकीय गन्तव्य बनाउन सबैले चिन्ता गर्नु पर्छ।
FAQ
प्रश्न – दरबारको संरक्षण मा कसले दिएँ चासो?
उत्तर – स्थानीय सरोकारवाला निकाय र सरकाले बेवास्ता गरे।

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